सोमवार, 9 दिसंबर 2013

ख्वाहिशों का राशिफल

वक़्त के साथ-साथ इंसान का जीवन के प्रति नजरिया भी बदलता रहता है। इंसान की उम्र और उसका अनुभव उसकी सोच पर निश्चित रूप से असर दिखाता है। उदाहरण के लिए जब हम टीनएज  या यंगस्टर होते हैं तो अपने डेली होरोस्कोप में लव और रोमांस वाले सेक्शन को सबसे पहले पढ़ते हैं और उसे ही जानने को सबसे ज्यादा उत्सुक रहते हैं। उसके बाद थोड़ा  परिपक्व होने पर वैवाहिक जीवन और कॅरिअर सम्बन्धी सेक्शन पर ध्यान देने लगते हैं। थोड़ी और उम्र बढ़ने पर हम बच्चे ,घर, सामाजिक  और सांसारिक कार्यकलापों से जुड़े सेक्शन को टटोलने लगते हैं। देखतें हैं कि समाज के दृष्टिकोण से सफल  कहलाने के लिए जो भी चीज़ें जरूरी है वो हमें मिलेंगी या नहीं? जैसे जीवन की उपलब्धियां, घर में सुख-शांति ,यश-सम्मान, सांसारिक वस्तुएं आदि। हमारी उम्र के साथ-साथ हमारी खुशियों और सफलता के पैमाने भी बदले रहते हैं। जीवन निश्चित रूप से परिवर्तनशील है और हमारी विचारधारा भी। या तो यूँ कहिये कि इस प्रगतिशील जीवन में हम जो पा लेते हैं उसके बारे में सोचना छोड़ देते हैं। और जो हमें पाना है उसके बारे में सोचते रहते है। उम्र के अंतिम पड़ाव तक हम कुछ न कुछ पाने को बैचैन रहते है और अपने डेली होरोस्कोप के जरिये जीवन में खोने-पाने का लेखा जोखा तैयार करते रहते हैं। पर हम ये भूल जाते हैं कि इस दुनिया में सबको सबकुछ नहीं मिलता।
दूर से देखने पर जो चीज़ें हमें अच्छी लगती हैं पास जाने पर पता चलता है कि उनकी वास्तविकता ही कुछ और है। इस दुनिया में किसी के पास पैसा है और परिवार नहीं, परिवार है तो प्यार नहीं ,और प्यार है तो स्वास्थ्य नहीं । ऊपर वाले ने हम में से हर एक की  जिंदगी में कुछ न कुछ कमी दी है। सर्वगुणसम्पन्न यहाँ कोई भी नहीं। तो जरूरत यह है कि जो हमारे पास है उसकी कीमत समझी जाये और जो नहीं है उसको पाने का प्रयास करते रहें। जो आपके भाग्य में है वो आपको खुदबखुद  मिल ही जायेगा और जो खुशियां आपके हिस्से में नहीं आने वाली हैं वो लाख कोशिशों के बावजूद भी नहीं मिलेंगी। तो फिर फ़िक्र किस बात की।
रोबिन शर्मा की  किताब 'द मोंक हू सोल्ड हिज़ फरारी' जीवन की  इसी बात की  तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करती है कि सब कुछ पाकर भी कुछ पाने कि तलाश ताउम्र ज़ारी रहती है। और अक्सर ऐसा होता है कि  कुछ पाने कि दौड़ में कुछ ऐसा पीछे छूट जाता है जिसकी भरपाई करना मुश्किल होता है।
इस किताब में एक ऐसे आदमी का ज़िक्र है जिसके पास पैसा, पावर, सफलता सबकुछ होता है लेकिन फिर अचानक एक दिन हार्टअटैक आने पर वह खुद को मौत के बहुत करीब पाता है। और उसे अहसास होता है कि सफलता और उपलब्धियों को पाने कि दौड़  में उसने जीवन का बहुत बड़ा भाग यूँ ही व्यर्थ कर दिया।
उसने पैसा तो कमाया लेकिन उस पैसे से उसे ख़ुशी नहीं मिली उल्टा उसने अपनी सेहत गँवा दी और वक़्त से पहले ही खुद को मौत के सामने खड़ा पाया। और फिर एक दिन वो अपना सब कुछ छोड़ कर हिमालय की श्रंखलाओं में फिर से एक नए जीवन कि खोज में निकल पड़ता है।
 तो कहानी का सार यही है कि जीवन की  उपलब्धि उसे सही प्रकार से जीने में है लेकिन जीवन जीने की  कला को जान लेना हर किसी के बस कि बात नही  है। वो तो विरले ही होते हैं जो इस सत्य को समझें हैं कि जीवन का उद्देश्य आखिर है क्या? सारी  जद्दोजहद के बाद अगर आप अंदर से खुश हैं तो सब ठीक है वर्ना सब कुछ बेकार है क्योंकि खुश रहने के लिए सबकुछ होना जरूरी नहीं होता यह तो  हमारे सोचने पर निर्भर करता है | कभी हमारे पास कुछ नहीं होता फिर भी हम बेहद खुश होते हैं और कभी सब कुछ मिल जाने पर भी कहीं कुछ कमीं लगती है। लेकिन शायद इसी का नाम  जिंदगी है।

मंगलवार, 17 सितंबर 2013


सचमुच रंगमंच ही तो है जीवन, मैं देख रही हूँ शांत भाव से। पता नहीं कहाँ खोयी हुई सी। तुमने ढेरों अपेक्षाएं डाली हुयी हैं मुझ पर। और मैं कुछ भी कर पाने में असमर्थ। फिजिकली प्रेजेंट एंड मेंटली एब्सेन्ट । पर क्यों , जीवन जैसा है हम खुद वैसे ही क्यों नहीं हो जाते। बड़ी मुश्किल होती है सामंजस्य बैठाने में । तुम अक्सर कहते हो सामंजस्य बिठाओ पर मैं तुम्हें कैसे बताऊँ मैं असमर्थ हूँ ऐसा कर पाने में । तुम बाहर की दुनिया से हाथ बड़ा कर खींचना चाहते हो मुझे वहां ,पर मैं तुम्हें क्या बताऊँ मैं किस कदर उलझी हुई  हूँ  अपने अन्दर की दुनिया में ।ढेरों काम हैं मुझे अभी वहां पर। बहुत शोर भी है। कैसे समझाऊँ तुम्हें अतीत के कितने हिसाब लगाने हैं । क्या खोया क्या पाया गुना भाग सब करना है अभी। और तुम खींच रहे हो मुझे वहां से । तुम ही बताओ दो नावों में पैर कैसे रखूँ मैं । इधर जाऊं या उधर जाऊं । कुछ समझ नहीं आता । सब कुछ फैला बिखरा सा है। टूटे सपनो के कितने टुकड़े  हैं जो साफ करने हैं । कितनी यादें है जिन्हें सलीके से लगाना  है एक तरफ दिमाग में , थोडा पीछे की तरफ़। कोशिश करती हूँ कि निकल जायें पूरी तरह दिमाग से ,लेकिन निकलती ही नहीं, नागफनी के पौधे की तरह बढ़ती ही जातीं  है। अन्दर ही अन्दर चुभती है। बहुत मुश्किल हैं इन यादों को लेकर जीना । थोडा वक़्त दो मुझे इन्हें हटा दूं फिर तुम्हारे सारे काम कर दूंगी। वो जरूरी डाक्यूमेंट्स जो मैं रख कर भूल गयीं हूँ शायद वो भी मिल जायेंगे ,तुम्हारा सारा जरूरी सामान जो मैं ठीक से नहीं रख पाती  हूँ ,वो भी संभाल पाऊँ।  पर अभी थोडा समय लगेगा मुझे अपने ख्यालों और वास्तविकता की दुनियां में तालमेल बिठाने में । निकलना खुद मैं भी चाहती हूँ इस भटकाव से लेकिन क्या करूं  निकल नहीं पा रही । कोशिश करती हूँ तुम्हारी अपेक्षाओं  पर खरी उतरने की, तुम्ही बताओ  क्या मैं फेल हो गयी हूँ जिन्दगी के इम्तिहान में । क्या मैं तुम्हारी उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाऊँगी । बस ये जो शोर सा है वो थम जाये फिर सब कर पाऊंगी जो तुम चाहते हो , जिम्मेदारियां संभालना, कर्तव्यों को निभाना, वगेरह ,वगेरह। सच मैं खुद चाहती हूँ , कि  यादो की इस आपाधापी से बाहर आऊं ,भविष्य को कोरे कैनवास  की तरह नए रंगों से सजाऊं  पर हो नहीं पाता । ये कुछ काले सफ़ेद से रंग हैं जो फ़ैल गए हैं मन की किताब पर, बहुत गहरे दाग है छूटते ही नहीं । 

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

Ab Ke Baras Bhej Bhaiya Ko Babul Asha Bhosle Film Bandini Music SD Burma...

आज हरियाली तीज है। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही है।  सुबह सोचा कि क्लास न लूं, लेकिन कुछ स्टूडेंट्स आ गए  तो मन न होते हुए भी क्लास ली। उसके बाद चाय का कप लेकर मैंने लैपटॉप पर अपना एक बहुत ही पसंदीदा गाना लगाया। बाबुल मोरा ……   नैहर छूटो ही जाये…. , जगजीत और चित्रा  की आवाज में ये गीत सुनकर जैसे दिल में एक दर्द सा उठा । ऐसा लगा कि  जैसे कोई पुराना जख्म ताजा हो गया हो। हरियाली तीज के मौके पर किसी लड़की को अपने मायके की  याद न आये ऐसा कैसे हो सकता है। ऐसे मौकों पर मैं अक्सर भावुक हो जाती हूँ। बहुत खूबसूरत बचपन था मेरा । बिलकुल किसी राजकुमारी जैसा । लेकिन फिर भी मैं अपने बचपन की यादों से अक्सर नज़रे चुराती हूँ क्योंकि मेरे बचपन की यादों में सबसे ज्यादा प्यारी याद  भैया की है, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं । तो ऐसे मौकों पर मेरा मूड कुछ ख़राब होना स्वाभविक है। फिर भी जीवन है ,जो चलता रहता है। मौकों और माहौल से यूँ भी मेरे मिजाज़ का तालमेल कम ही बैठता है। मौके ,मौसम, माहौल और मिजाज़ अक्सर कुछेक पुराने सुने हुए गीतों  की याद  दिलाते हैं । सावन के ऐसे ही गीतों में एक और बेहद खूबसूरत गाना है- "अब के बरस भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय रे"। नूतन पर फिल्माया, बंदिनी फिल्म का गाना। जो मेरे चाचाजी हारमोनियम पर गाया करते थे। मैं कभी भी इस गाने को बिना रोए पूरा नहीं सुन पाई, "मैं तो बाबुल तेरे अंगना की चिरिया ,फिर क्यों हुई  मैं परायी"……… ।   किसी बेटी के दिल में उसके मायके की यादो को दर्शाने  के लिए इस गाने से सुन्दर और  कोई उदाहरण नहीं है। यूँ  तो मैं अक्सर अपने मायके चली जाती हूँ, लेकिन माँ-बाप से दूर रहकर उनके लिए कुछ न कर पाने की पीड़ा हर बेटी के दिल को सताती है ,जो समाज द्वारा निर्मित परम्पराओं की देन है। खैर जो भी हो , बाहर मौसम बहुत खूबसूरत  है और आज मिजाज़ भी अच्छा है, तो क्यों न हरियाली तीज के इस अवसर का पूरा -पूरा लुत्फ़ उठाया जाये। तो फिर चलिये , मेहरून बोर्डर की गहरे हरे रंग की साड़ी  पहन कर पतिदेव को सरप्राइज़ किया जाये। मेहँदी का भी प्रोग्राम है। और शाम को मम्मी के यहाँ जाना तो बनता ही है।

आज हरियाली तीज है। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही है।  सुबह सोचा कि क्लास न लूं, लेकिन कुछ स्टूडेंट्स आ गए  तो मन न होते हुए भी क्लास ली। उसके बाद चाय का कप लेकर मैंने लैपटॉप पर अपना एक बहुत ही पसंदीदा गाना लगाया। बाबुल मोरा ……   नैहर छूटो ही जाये…. , जगजीत और चित्रा  की आवाज में ये गीत सुनकर जैसे दिल में एक दर्द सा उठा । ऐसा लगा कि  जैसे कोई पुराना जख्म ताजा हो गया हो। हरियाली तीज के मौके पर किसी लड़की को अपने मायके की  याद न आये ऐसा कैसे हो सकता है। ऐसे मौकों पर मैं अक्सर भावुक हो जाती हूँ। बहुत खूबसूरत बचपन था मेरा । बिलकुल किसी राजकुमारी जैसा । लेकिन फिर भी मैं अपने बचपन की यादों से अक्सर नज़रे चुराती हूँ क्योंकि मेरे बचपन की यादों में सबसे ज्यादा प्यारी याद  भैया की है, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं । तो ऐसे मौकों पर मेरा मूड कुछ ख़राब होना स्वाभविक है। फिर भी जीवन है ,जो चलता रहता है। मौकों और माहौल से यूँ भी मेरे मिजाज़ का तालमेल कम ही बैठता है। मौके ,मौसम, माहौल और मिजाज़ अक्सर कुछेक पुराने सुने हुए गीतों  की याद  दिलाते हैं । सावन के ऐसे ही गीतों में एक और बेहद खूबसूरत गाना है- "अब के बरस भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय रे"। नूतन पर फिल्माया, बंदिनी फिल्म का गाना। जो मेरे चाचाजी हारमोनियम पर गाया करते थे। मैं कभी भी इस गाने को बिना रोए पूरा नहीं सुन पाई, "मैं तो बाबुल तेरे अंगना की चिरिया ,फिर क्यों हुई  मैं परायी"……… ।   किसी बेटी के दिल में उसके मायके की यादो को दर्शाने  के लिए इस गाने से सुन्दर और  कोई उदाहरण नहीं है। यूँ  तो मैं अक्सर अपने मायके चली जाती हूँ, लेकिन माँ-बाप से दूर रहकर उनके लिए कुछ न कर पाने की पीड़ा हर बेटी के दिल को सताती है ,जो समाज द्वारा निर्मित परम्पराओं की देन है। खैर जो भी हो , बाहर मौसम बहुत खूबसूरत  है और आज मिजाज़ भी अच्छा है, तो क्यों न हरियाली तीज के इस अवसर का पूरा -पूरा लुत्फ़ उठाया जाये। तो फिर चलिये , मेहरून बोर्डर की गहरे हरे रंग की साड़ी  पहन कर पतिदेव को सरप्राइज़ किया जाये। मेहँदी का भी प्रोग्राम है। और शाम को मम्मी के यहाँ जाना तो बनता ही है।

सोमवार, 8 जुलाई 2013

"दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन…."

           गर्मी की छुट्टियाँ खत्म , फिर से जिन्दगी अपने उसी पुराने ढर्रे पर चल पड़ी है। खूब सोये, फिल्में देखीं, किताबें पढी , घूमे फिरे और मज़ा किया । पर हमेशा तो ये सब नहीं चल सकता है न। तो फिर शुरू हो गया काम का सिलसिला।। सुबह जल्दी उठ कर बच्चों को स्कूल भेजना, पति को ऑफिस और खुद भी अपनी  क्लास के लिए तैयार होना।  काम निबटाते -निबटाते रात के 12  बजेंगे और थकावट से चूर आप कब सो जायेंगे पता ही नहीं चलेगा | और इसी तरह हमारी जिन्दगी का और एक दिन गुज़र गया । पर जनाब इसी का नाम तो है जिन्दगी | आराम के लिए वो एक सन्डे भी तो मिलता है। तो उस दिन सोचते हैं कि घर और बाहर के सारे पेंडिंग काम निपटा लिए जायें । तो सन्डे तो आने वाले हफ्ते की सारी तैयारियों में ही निकल जाता है।
      लेकिन मेरे लिए फुर्सत का मतलब ढेर सारा आराम करना नहीं है। छुट्टियाँ या फुर्सत मेरे लिए वो कीमती और बहुत मुश्किल से मिलने वाला वक़्त है जो मैं अपने और अपने परिवार के साथ गुज़ारना चाहती हूँ । सैर सपाटा करते हुए नहीं और ना हीं फिल्म देखते हुए और ना ही बाहर किसी अच्छे रेस्तरां में खाना खाते हुये। बल्कि वो खाली वक़्त जब हम थोडा थमें, रुकें और सोचें कि  हम आखिर कहाँ जा रहे हैं । हम घर चलाने के लिए कमाते हैं, बच्चे अपने बेहतर भविष्य की तैयारी के लिए पढ़ाई करने में लगे हुए हैं । लेकिन इन सब के बीच जो धीरे -धीरे ख़ामोशी से खिसक रहा है. वो हमारा आज, मेरे लिए वही फुर्सत, वही वक़्त बेहद जरूरी चीज़ है। वही तो है जिन्दगी, जो दस-दस साल के अन्तराल में बदली हुई सी लगती है | पता नहीं चलता कैसे रेंग कर गुज़र जाती है हमारी पहुँच से बहुत दूर। और हम कहते हैं कि पता नहीं चला बच्चे कब बड़े हो गए, वक्त  कैसे गुज़र गया ।
      तो जब भी मुझे फुर्सत के पल मिलते हैं तो मैं चाहती हूँ कि परिवार के साथ रहूँ, खुद को वक्त दूं, और वो सब करूं जो मैं अब इसी आज में करना चाहती थी। चाहें फिर उनके साथ बैठ कर उनके स्कूल की शैतानियों भरे किस्से सुनना ही क्यों न हो और या फिर उनकी कभी न ख़त्म होने वाली फरमाइशों की लिस्ट जानना ।
 हम सब हमेशा अपने ही कामों में लगे रहते हैं, देखा जाये तो हम अपने जीवन का आधे से ज्यादा समय सोने में, दैनिक कार्यों में ,पढाई करने में और नौकरी या बिज़निस में ही निकल देते हैं । रहा सहा आधा समय मित्रों, रिश्तेदारों, सगेसम्बंधियों और भी बहुत से सोशल ओब्लिगेशन्स को निबटाने में निकल जाता  हैं। परिवार का नंबर आते-आते इतनी देर हो जाती है कि सुनने को मिल ही जाता है ' आपके पास टाइम है ही कहाँ?' मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो हमेशा टाइम न होने का रोना रोते रहते हैं ।  टाइम मैनेजमेंट  तो एक ऐसी कला है जो कॉर्पोरेट ट्रेनर नहीं बल्कि खुद समय और आवश्यकता ही हमें सिखा देती है | लेकिन मेरी यही कोशिश है कि बिज़ी और खाली समय के बीच एक संतुलन बना रहे। और शायद मेनेजमेंट की भाषा में उसी को कहते हैं वर्क- लाइफ- बेलेंस | क्योंकि कहा जाता कि हमारे जीवन के लिए काम करना जितना जरूरी है ,खाली रहना भी उतना ही जरूरी है । क्योंकि व्यक्ति रचनात्मक तभी हो  सकता है जब उसके पास ढेर सारा समय हो। विचारों के पनपने और उनके संयोजन में खाली समय का बहुत योगदान होता है। इस बात पर एक पुराने गीत की लाइनें याद आ रही हैं "दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन…."

बुधवार, 12 जून 2013


हम कितने भी पढ़े लिखे और आधुनिक क्यों न हो जायें,  अन्दर से हम सब कहीं न कहीं अपनी जड़ों से जुड़े हुए रहते है। बचपन से हम अपने बड़ो को जिन विश्वासों और मान्यताओं के साथ जीते देखते आये हैं, धीरे-धीरे हम भी उन्हीं विश्वासों के साथ जीने लगते हैं । पता नहीं चलता कब ये विश्वास हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन जाते हैं । कुछ मान्यताएं तो हमारी जीवनशैली में कुछ इस कदर  शामिल हो जाती हैं कि उन्हें अपने जीवन से अलग करना हमारे लिए असंभव सा हो जाता है। ये विश्वास चाहें धर्म से जुड़े हो या वास्तुशास्त्र  से और या फिर हमें पीढ़ी  दर पीढ़ी बताए गए  हैं लेकिन इनका मूल उद्भव कहाँ से हुआ है ये कोई नहीं बता पाता । लेकिन हम सब फिर भी आंख बंद कर के इन पर विश्वास करते रहते हैं ।
 बिल्ली का रास्ता काटना, छींकना ,आंख का फड़कना, दूध का उफन जाना, हिचकी आना  और भी जाने कितनी बातें हैं जो हम बचपन से ही मानते चले आ रहे हैं । हम सभी अपने भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं, लेकिन किसी नियत समय पर किसी घटना का घटित होना क्या हमें संकेत दे सकता है कि हमारे साथ अच्छा  होने जा रहा है या बुरा ।                                                                                                                      शंकाओं से भरे रहना मानव मन का स्वभाव है लेकिन हमारे दैनिक जीवन से जुडी इन छोटी छोटी बातों  से हम और भी चिंतित हो उठते है। शगुन  अपशगुन तो हम सभी मानते हैं लेकिन क्या सच में  अच्छे और बुरे शगुन हमें भविष्य के बारे में आगाह करने के लिए होते है। कहीं कहीं तो ये भी कहा जाता है कि चप्पल के उलटे हो जाने से या कैंची बजने से घर में झगड़ा हो सकता है, या कौए के छत पर बोलने से या बर्तन के गिरने से घर में मेहमान आते हैं । इसी तरह माना जाता हैं कि मंगलवार और ब्रहस्पतिवार के दिन डॉक्टर के नहीं जाना चाहिये या कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिये ।
 इसी तरह बुरी नज़र को लेकर हमारे समाज में ही नहीं पूरे संसार में विचार बने हुए हैं कि ये न सिर्फ मनुष्य के स्वास्थ और प्रगति पर अपना असर दिखाती हैं बल्कि जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करती है। यहाँ तक कि पश्चिमी देशों में लोग ईविल आई के चिन्हों वाली वस्तुओं को पहने रहते हैं । आज जब विज्ञानं ने इतनी प्रगति कर ली है फिर भी लोगों का ये विश्वास बदला नहीं है कि किसी  की नज़र लग जाने से किसी का अहित हो सकता है। यहाँ तक कि फिल्म स्टार और बड़े -बड़े सेलेब्रिटी भी नज़र से बचने के उपाय करते रहते हैं ।
इन सब बातों  का भले ही कोई वैज्ञानिक आधार न हो लेकिन फिर भी विश्वास बहुत बड़ी चीज़ है। किसी भी विचार या मान्यता को सदियों तक दोहराये जाने पर हमारा मन उस पर विश्वास करने को मजबूर हो ही जाता है। फिर कहते हैं न कि  ईश्वर को किसने देखा है ? वो भी तो एक विश्वास ही है। 

शनिवार, 25 मई 2013


ये फुर्सत भरे दिन,  आओ तुम्हें बता दूं कि क्या खज़ाना भरा हुआ है तुम्हारे अन्दर  , थोड़ी देर रुको तो सही, ठहरो, फिर वक़्त मिले न मिले, तुमसे बहुत कुछ सीखना बाकी  है, तुम जाओ उससे पहले तुम्हें आखिरी विदा तो दे दूं , क्योंकि कभी तुम्हारे जाने के बाद मैं अपनी नाखून से ज़मीन  को खरोचते हुये ,या तकिये में मुंह छुपा कर , ये मांगूं की काश तुम वापिस लौट आओ। "
आखिर गर्मियों  का वो वक़्त आ ही गया जब बोरियत और आलस्य अपने चरम पर है।  ये बारिश का वो सुहाना मौसम भी नहीं है कि  जब बच्चे “let’s do something crafty" करके अपना समय बिताते है।ये मौसम जब आता है तो अपने साथ एक अजीब सा खालीपन भी ले आता  है, वक़्त मानो काटे ही नहीं कटता  और कुछ भी करने का मन नहीं करता है। घर के दरवाज़े का बार-बार खुलना और बंद होना भी नहीं हो रहा है। ना ही  बार-बार डोरबेल परेशान  कर रही है। दोपहर में घर से बाहर निकलना मानो जैसे जंग पर जाने की तैयारी हो।  और घर मैं रहना उस से भी ज्यादा खतरनाक |
ऐसे में बच्चे या तो टीवी से चिपके रहते हैं या फिर फ्रीज़र में रखी हुई  आइसक्रीम के आखिरी स्कूप के लिए लड़ाई करते है। ऊपर से उनका शिकायतें करते हुए मेरे पास आना । पता नहीं उन्हें क्यूँ लगता है कि उनकी सारी  परेशानियों का हल मेरे ही पास है। तो जब ये खाली वक़्त गुज़र जायेगा तो मैं उनकी इन शिकायतों  को मिस करूंगी | या कभी यूँ भी होगा कि उन्हें अपनी परेशानियों को सुलझाने के लिए मेरी जरूरत ही नहीं  होगी | जब बच्चे शिकायतें करते हैं तो उन्हें पता होता है कि मैं उनकी मदद कर सकूंगी | क्या पता एक दिन उन्हें मेरी मदद की जरूरत भी  नहीं रहेगी | पर आज तो है। और मैं उनकी मदद करती रहूंगी इस बोरियत भरे समय को गुजारने में | और उन्हें पूरा मौका दूँगी शिकायतें करने का | 
आज की व्यस्त जीवन शैली में, लक्ष्यप्राप्ति के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे बच्चों के लिए गर्मियों का ये खाली समय किसी उपहार से कम नहीं है। ये खाली समय न सिर्फ उन्हें अपनी समस्याओं को अपने  तरीके से सुलझाने में मदद करता है बल्कि और नई  रचनात्मक चीज़ों की तरफ रुझान बड़ाने में मदद करता हैं|  ये समय उन्हें उनके अपने सपनो और ख्वाबों में खोये रहने देने का मौका देता है | यही वो वक़्त है जब वे सीखतें हैं कि वे कैसे अपने जीवन में बहुत सी रोचक चीज़ें कर सकते हैं | और बोरियत एक रास्ता है जीवन के बहुत सारे नए रास्तों को जानने का|