रविवार, 23 मार्च 2014

जमुना

                                              
अपने जीवन में बहुत सी सशक्त महिलाओं से मेरा परिचय हुआ। कई  उच्चशिक्षित, आत्मनिर्भर ,बुद्धजीवी  एवं दबंग महिलाओं  से मेरा संपर्क रहा है,लेकिन जीवन जीने की कला को सीखने में जिन्हें मैंने अपनी प्रेरणा माना वे एक बहुत ही साधारण सी ,सीधी-साधी ,घरेलू  महिला थीं,  मेरी दादी -श्रीमती जमुना देवी। जिन्हें मैं  अम्मा कहा करती थी। अम्मा ने शायद कभी किसी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा था लेकिन अपने जीवन की पाठशाला ने उन्हें बहुत कुछ सिखा दिया था। आज जब भी कभी मैं छोटी -छोटी  समस्याओं से घबरा जाती हूँ तो बरबस ही वे मुझे याद  आ जाती है। सहनशीलता और सामंजस्य इन शब्दों का सही मतलब मुझे अम्मा ने ही सिखाया। अम्मा जिनकी छाया  में मैंने अपना बचपन बिताया, वे मुझे अपनी दादी के रूप में नहीं बल्कि अपने बचपन की एक सखी के रूप में याद  आती हैं। मैं  उनके साथ खेलती थी, नाचती-गातीं  थी,दुनिया भर की बातें करती थी। लेकिन अब उनके जाने के बाद मुझे समझ आया है कि  खेल खेल में ही अम्मा मुझे जिन्दगी का ककहरा समझा गयीं। अम्मा का स्वाभाव उनके नाम के अनुरूप ही था, जमुना की अरह ऊपर से चंचल और अन्दर से शांत,गंभीर । जो वृद्धावस्था तक एक सा ही रहा। नब्बे साल की उम्र तक भी उनमें किशोरियों जैसी चंचलता थी। दुबली पतली, छोटे  कद की अम्मा  में गज़ब की फुर्ती थी। अपनी युवावस्था के दिनों में वो कैसी रही होंगी ये तो उनकी धुंधली, ब्लैक एन वाईट  तस्वीरों को देख कर ही थोडा बहुत अन्दाजा अम्मा ने जो मुझे बताया उससे मैंने यही जाना की उकी शादी बारह वर्ष की उम्र में ही कर दी गयी। पाँच  बहनों वाले मध्यमवर्गीय परिवार में अमा दुसरे नंबर की संतान थीं। यही कारण था की उनकी बातों  में हमेशा उनकी ससुराल का ही वर्णन मिलता था। स्कूली शिक्षा न मिलने के बावजूद किताबें अम्मा के जीवन का अभिन्न हिस्सा थीं धार्मिक, किस्से-कहानियों की, नीम हकीम वाली, हस्त रेखा , अंक ज्योतिष, स्वप्न फल अदि हर अरह की किताबों को अम्मा बेहद रूचि से पढ़ती थीं। पुरानी  से पुरानी  किताब को भी वे जिल्द लगाकर संभल कर रखती थीं।
मेरे दादाजी श्री धरनीधर शर्मा एक बेहद ही आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे।
गोरा रंग, नीली आँखें, लम्बा कद कहा जाता है की वे जब अंग्रेजों के बीच बैठते थे तो बिलकुल उन जैसे ही लगते थे। और अम्मा इस के बिलकुल विपरीत थी। आकर्षक नैन नक्श होते हुए भी  अम्मा केवल रंग और कद काठी में बाबा से मेल नहीं खाती थीं। अम्मा का मायका आगरा की लालकिले वाली सड़क पर था जिसके एक तरफ यमुना नदी बहती है,जिसे यमुना किनारा रोड भी कहा जाता है। अम्मा बताती थीं की उनकी सगाई होने के बाद बाबा उसी रस्ते से अपने विद्यालय जाया करते थे तो उनकी बहाने चिल्लाकर कहती थीं जमुना देख तो कौन जा रहा है ? और अम्मा लपक कर घूंघट की ओट  में से छज्जे से बाबा को निहार लिया करती थीं।
एक बार जब शादी के बाद अम्मा और बाबा ट्रेन से सफ़र कर रहे थे तो उनके डिब्बे में बैठी एक अँगरेज़ महिला उन्हें देख कर कहने बोली की हिन्दुस्तानियों को शायद जोड़े बनाना नहीं आता है। इस पर अम्मा केवल मुस्कुरा कर रह गयीं थीं। लेकिन इन बातों  से उनके प्रेम में कभी अंतर नहीं आया। बाबा ज्वाला बैंक में मेनेजर हुआ करते थे। उनकी पोस्टिंग सहारनपुर में थी। शादी के 22 वर्ष तक अम्मा के कोई संतान नहीं हुयी थी। घर की बड़ी बहु सो छोटी उम्र में ही उनके सास ससुर उनसे बहुत से पोते  पोतियों की अपेक्षा करने लगे थे।बहुत इलाज कराया गया। किसी ने कुछ बताया और किसी ने कुछ। लेकिन जब अम्मा की देवरानी के भी संताने हो गयीं तो घरवालों का धेर्य टूटने लगा। वर्षों तक अम्मा बाँझ होने का लांक्षन सहती रही।लोगो के प्रश्नों और व्यंगों को सहती रहीं। कई बार तो बाबा के दुसरे विवाह कराये जाने की बात भी की जाने लगीं। लेकिन भगवान के अलावा और किसी के सामने विचलित नहीं हुयी। असीम धेर्य था अम्मा में। उनकी मूक प्रार्थनाओं को आखिर इश्वर ने सुन ही लिया और चोंतीस साल की उम्र में अम्मा की सूनी गोद भर ही गयी। पापा का जन्म हुआ। अम्मा बाबा को जैसे भगवन ही मिल गए हों। बड़े ही लाड़ -प्यार  से उन्होंने पापा का नाम राजकुमार रखा। पापा के जन्म के छः साल बाद उनके छोटे भाई का जन्म हुआ। अम्मा का जीवन बस केवल बाबा और उनके दो बेटों के ही इर्द गिर्द घूमता था। गृहस्थी की भागमभाग के बीच उन्होंने दुनियादारी भी सीखा ही ली। अम्मा थोडा बहुत हाथ भी देख लिया करती थीं। या तो वास्तव  में उन्हें हस्तरेखा का ज्ञान था या फेस रीडिंग कहिये कि अम्मा जो बतातीं  थी वे अधिकतर  बातें सच निकलती थीं। अम्मा बेहद ही प्रेमपूर्ण थीं। लोग उनकी बातों  को मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे। वे हमेशा लोगो की प्रशंसा कर के उन्हें मनोबल दिया करती थीं।
          अपने अंतिम दिनों में अम्मा ने पैसों को हाथ लगाना छोड़ दिया था , क्योंकि उन्हें लगता था कि माया ही सब  दुखों का कारण है। या फिर बेटे बहुओं और नाती पोतों से भरे घर में उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं महसूस होती थी। वजह चाहें जो भी हो उन्होंने जीवन को सही अर्थो में जिया और अंत तक उनके मन में और जीने की इच्छा बनी रही। उन्होंने हमेशा मुझे यही समझाया कि जीवन एक संघर्ष है और उसका सामना हमें हँसते -मुस्कुराते हुए करना चाहिए। उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुँच कर भी उन्होंने अपनी चंचलता और हंसमुख स्वभाव को नहीं छोड़ा। और हम सबके मन में अपनी वही सरल-सहज  ममतामयी छवि बसा कर वे सदा के लिए ईश्वर में लीन  हो गईं।




कॉमिक्स के दिन

                                




बच्चों  के एक्जाम्स क्या ख़त्म हुए  मानो मेरा सरदर्द शुरू हो गया । मुद्दा वही एक कि आखिर फ्री टाईम  में करें तो क्या करें ? एक के बाद एक फरमाइशों कि लिस्ट  आने लगीं।  मुझे प्ले-स्टेशन कि नई  सीडी चाहिए, मुझे डांस क्लासिस ज्वाइन करनी हैं, मेरे लिए बार्बी की एसेसरीज़ का सेट चाहिए, वगैरह वगैरह। खूब भागम- भाग के बाद भी बच्चे संतुष्ट नहीं होते।  मैं अपने बचपन को याद करने लगी। डिमांड्स हमारी भी हुआ करती थीं ,लेकिन ऐसी नहीं कि जिन्हें पूरा करते करते माँ बाप का मंथली बजट  ही गड़बड़ा जाये। फिर हमारे टाइम पास करने के साधन भी लिमिटिड ही हुआ करते थे। जैसे लूडो, सांप-सीढ़ी , कैरम, दूरदर्शन और सबसे ज्यादा रोचक चीज़ यानि कि कॉमिकस। मझे याद  है कि कैसे मैं और मेरे भाई नई-नई कॉमिक्स पड़ने के लिए पागल से रहते थे। चम्पक, नंदन, चाचा चौधरी, फैंटम ,चंदा मामा, मोटू-पतलू , और भी न जाने  कितने नामों से कॉ मिक्स  आया  करती थीं उस वक़्त। जिन्हे पड़ने में हम इतने खो जाया करते थे कि समय कब कट जाता था पता ही नहीं चलता था। उस वक़्त भी वीडीओ गेम्स थे लेकिन कॉमिक्स हर बच्चे को आसानी से उपलब्ध होने वाली मनोरंजन की  सबसे लोकप्रिय चीज़ थी। बच्चो के अंदर रीडिंग हैबिट को डेवलप करने का ये एक बहुत ही सरल और रोचक  माध्यम हुआ करता था। टीवी पर आने वाले ढेरों कार्टून कैरेक्टर्स  की तरह ही कॉमिक्स के वो पात्र हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते थे।. बच्चे उन पात्रों के लिए कितने दीवाने रहते थे।
                                        सच में इस सेटेलाइट चैनल्स और हाई फाई गेम्स के समय में कॉमिक्स का अस्तित्व पूरी तरह ख़त्म सा ही हो गया है। मैं कॉमिक्स के उन पात्रों को बहुत ही मिस करती हूँ, जो उस वक़्त मुझे बिलकुल सच्चे लगते थे। आज मैं बच्चो के लिए किताबें लेने बाज़ार निकलती हूँ तो बुक स्टॉल्स पर केवल कुछ गिनी चुनी ही कॉमिक्स नज़र आतीं हैं।  मनोरंजन के साधन जितने ही बढ़ते जा रहे हैं हमारे बच्चे उतने ही असंतुष्ट होते जा रहे हैं ,शायद बच्चो के अंदर के भोलेपन  को सहेजे रख कर उन्हें स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करने का कॉमिक्स से अच्छा जरिया और कोई हो ही नहीं सकता है। 

शनिवार, 4 जनवरी 2014

नेटवर्किंग कम्पनियों ने आजकल जो हमारे चारों तरफ जाल बिछाया हुआ है उसके उदहारण हमें आये  दिन देखने को मिल जाते हैं । यूँ तो आजकल कोई भी बिना मतलब के आपसे बात करेगा नहीं और अगर करेगा तो सावधान हो जाइयेगा ,या तो वो किसी मल्टीनेशनल कंपनी के महंगे उत्पाद आपको बेचना चाहता है या फिर किसी बैंक में सेल्स एड्वाइजर होगा । पहले तो आप उस व्यक्ति के मधुर व्यवहार के कायल हो जायेंगे लेकिन बाद में जब आप को पता चलेगा कि ये उसकी मार्केटिंग का हिस्सा है तो आप उससे पीछा छुड़ाने के बहाने ढूंढते फिरेंगे। मेरे साथ भी हाल ही में ऐसे कई वाक़ये हुए। जिनमें से एक तब का है जब मैं चंडीगढ़ में रहा करती थी , एक दिन सुबह जब मैं अपने बच्चों की  स्कूल बस के लिए इंतज़ार कर रही थी तो एक सुन्दर और सभ्रांत सी दिखने वाली महिला मुझे देख कर मुस्कराई , आमतौर पर मैं अजनबी लोगो से थोड़ा रिजर्व रहने की  कोशिश करती हूँ लेकिन चूंकि वह महिला मुझे भले घर कि लग रही थीं और मेरी ही उम्र की  थी तो जवाब में मैं भीं मुस्कुरा दी।  फिर अचानक ही एक दिन शाम के वक़्त वो अपने पति को लेकर मेरे घर आईं।  पता चला कि जिस तरह उनकी और मेरी मुलाकात हुई थी उसी तरह मेरे और उनके पति भी मिल चुके हैं ,उनका इस तरह का बेतकल्लुफ़ व्यहवहार पहले तो मुझे अजीब लगा लेकिन जब मुझे पता चला कि वे लोग भी यूपी  के हैं तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि चलो अनजाने शहर में कोई तो अपना मिला । मैं मन ही मन खुश हो रही थी कि ऐसा नहीं है कि दुनिया में सभी लोग मतलब से दोस्ती करते हैं, अगर आप अच्छे हैं तो आप को भी आपके जैसा कोई न कोई मिल ही जायेगा। थोड़ी देर बातचीत करने के बाद वो पूछने लगीं कि मेरा बेटा इतना कमजोर क्यों है? फिर उन्होंने कुछ एनर्जी ड्रिंक्स के बारे में बताया जिन्हें पिलाने से बच्चों का वजन बढ़ जाता है।  मैंने आदत के अनुसार उनकी हाँ में हाँ मिला दी । फिर पता चला कि वे एक मल्टीनेशनल कम्पनी के लिए काम करती हैं। अब मेरी समझ में आ गया कि उनका हमसे बात करना, घुलना मिलना कुछ और नहीं बल्कि नेट्वर्किंग था। जी हाँ घर बैठे आसानी से पार्ट टाइम काम करके पैसा कमाने का नया तरीका । और फिर तो वो जैसे हमारे पीछे ही पड़  गई। आये दिन वो हमें अपने उत्पादों के फायदे बतातीं  और उन्हें खरीदने के लिए हमें समझाया करतीं ।और में उनसे पीछे छुड़ाने के बहाने सोचा करती।
यहाँ आगरा मेंभीमुझे दो तीन लोग ऐसे मिले जो पहली मुलक़ात में ही बहुत घुल मिल गए , उनसे मिल कर भी मुझे यही लगा कि वास्तव में दुनिया में सच्ची मित्रता अभी भी कायम है,लेकिन बाद में वे भी इन्हीं नेटवर्किंग कम्पनियों का हिस्सा निकले।

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

मिर्ज़ा ग़ालिब की 216 वीं सालगिरह पर


Mirza Ghalib 212 Birthday

  1. "हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे ,कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़-ए-बयां औऱ !"

यूँ ही लोकल अख़बार के पन्ने पलटते हुए पढ़ा कि मेरे घर के पीछे की गली में स्थित ग़ालिब की हवेली यानि इंद्रभान गर्ल्स इंटर कॉलेज में मिर्ज़ा ग़ालिब की स्मृति में एक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। और फिर पता चला कि चचा तो अपने पडोसी निकले। हमारी नज़रों में उनसे बढ़  कर कोई लिखने वाला नहीं और हमसे बढ़ कर कोई पढ़ने वाला नहीं। मैं लगभग उछल पड़ी ,मिर्ज़ा ग़ालिब मेरे पीछे कि गली में? और मैं दुनियाभर कि किताबों में उनको ढूंढ़ती फिर रही थी । कॉलेज के ज़माने में कैसेटों और किताबों में ,और अब पूरा गूगल छान मारा है कि मरने से पहले ग़ालिब कि कोई भी नज़्म बिना पढ़े न रह जाये। वो ठहरे शायरी के देवता और हम पुजारी।  हार्डकोर फेन कसम से। 
   तो थोडा बहुत रिसर्च करने पर पता चला कि इनका मूल निवास आगरा ही था , मेरा घर यानि कि बेलनगंज के पीछे एक पुराना मोहल्ला है- काला महल ,वहीँ पर एक मकान  हुआ करता था जो अब एक कन्या विद्यालय में बदल दिया गया है। तो मियां मिर्ज़ा ग़ालिब यानि नज़्म-उद -दुल्लाह मिर्ज़ा असदुल्लाह बैग़ खां का जन्म इसी हवेली में हुआ था। उनका जीवनकल 27 दिसम्बर 1797 से 15 फ़रवरी 1869  तक रहा। ये वो वक़्त था जब मुगलों का शासनकाल अपने पतन पर था और ब्रिटिशों ने हिंदुस्तान में अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी थी। जब वे ५ वर्ष के थे तो उनके पिता अलवर के युद्ध में मारे गए थे। उनका पालन-पोषण उनके चचा मिर्ज़ा नसरुल्लाह बैग खां ने किया था। उन्होंने ११ वर्ष कि उम्र में लिखना शुरू किया। १३ साल कि उम्र में उनका निकाह उमराव  बेगम से हुआ था। जिनसे उनके सात संताने हुई लेकिन दुर्भाग्यवश एक भी जीवित नहीं बची।  
उन्होंने अपने जीवन काल में बहुत सी ग़ज़लें ऑर नज़में  लिखी जिन्हें बहुत से अलग -अलग लोगो ने अलग-अलग अंदाज में प्रस्तुत किया। मुग़ल दरबार में वे अपनी शायरी के लिए मशहूर थे। ग़ालिब को न केवल भारत और पाकिस्तान में बल्कि दुनिया के बहुत से उर्दू पढ़े जाने  वाले मुल्कों में उर्दू का सर्वोच्च शायर माना  जाता है। उनकी शायरी ज्यादातर जिंदगी के रंजोग़म  का आईना थीं , लेकिन उनमें  प्रेम, अध्यात्म और दर्शन का भी मिला जुला रूप देखने को मिलता है। वे उर्दू, फ़ारसी और तुर्की भाषाओँ पर सामान अधिकार रखते थे लेकिन उनकी रचनाएं सिर्फ उर्दू में ही देखने को मिलती हैं। ग़ालिब को उर्दू का पहला दानीश्वर शायर कहा जाता है। दीवान-ए -ग़ालिब  को आज भी उर्दू शायरी में एक खास स्थान प्राप्त है।  
Mirza Ghalib Picture
Mirza Ghalib







सोमवार, 9 दिसंबर 2013

ये पता नहीं मौसम का असर होता है या आपके अपने  ही दिमाग में होने वाले साइकोलॉजिकल प्लस बाईलॉजिकल चेंजस  का असर , जिससे आपकी दिनचर्या प्रभावित होती रहती है। कभी बहुत नींद आती है बेहिसाब, इतनी कि रात में पूरी नींद ले लेने के बावजूद भी दिन भर सोये रहने का मन करता है | और कभी ऐसा भी होता है की नींद आपसे कोसो दूर भाग जाती है । ऐसा लगता है कि सुबह जल्दी उठ कर अपने सारे काम निपटा लिया जायें । सोना तो जैसे टाइम की बर्बादी लगता है। कभी सबसे बात करने का दिल करता है और कभी किसी से भी नहीं। और कभी -कभी तो ऐसा लगता है जैसे आप एक ऐसे शहर में हैं जहाँ कोई और जबान बोली जाती है। आप किसी से बात करेंगे तब भी कोई आप  की बात नहीं समझ नहीं पाएगा। ये एकाकीपन क्या मेरे ही साथ होता है या सभी इसका अनुभव करते हैं। समझ नहीं आता कि क्या है ये खालीपन सा जो भीड़ में जाने के बाद और बढ़ जाता है। 

ख्वाहिशों का राशिफल

वक़्त के साथ-साथ इंसान का जीवन के प्रति नजरिया भी बदलता रहता है। इंसान की उम्र और उसका अनुभव उसकी सोच पर निश्चित रूप से असर दिखाता है। उदाहरण के लिए जब हम टीनएज  या यंगस्टर होते हैं तो अपने डेली होरोस्कोप में लव और रोमांस वाले सेक्शन को सबसे पहले पढ़ते हैं और उसे ही जानने को सबसे ज्यादा उत्सुक रहते हैं। उसके बाद थोड़ा  परिपक्व होने पर वैवाहिक जीवन और कॅरिअर सम्बन्धी सेक्शन पर ध्यान देने लगते हैं। थोड़ी और उम्र बढ़ने पर हम बच्चे ,घर, सामाजिक  और सांसारिक कार्यकलापों से जुड़े सेक्शन को टटोलने लगते हैं। देखतें हैं कि समाज के दृष्टिकोण से सफल  कहलाने के लिए जो भी चीज़ें जरूरी है वो हमें मिलेंगी या नहीं? जैसे जीवन की उपलब्धियां, घर में सुख-शांति ,यश-सम्मान, सांसारिक वस्तुएं आदि। हमारी उम्र के साथ-साथ हमारी खुशियों और सफलता के पैमाने भी बदले रहते हैं। जीवन निश्चित रूप से परिवर्तनशील है और हमारी विचारधारा भी। या तो यूँ कहिये कि इस प्रगतिशील जीवन में हम जो पा लेते हैं उसके बारे में सोचना छोड़ देते हैं। और जो हमें पाना है उसके बारे में सोचते रहते है। उम्र के अंतिम पड़ाव तक हम कुछ न कुछ पाने को बैचैन रहते है और अपने डेली होरोस्कोप के जरिये जीवन में खोने-पाने का लेखा जोखा तैयार करते रहते हैं। पर हम ये भूल जाते हैं कि इस दुनिया में सबको सबकुछ नहीं मिलता।
दूर से देखने पर जो चीज़ें हमें अच्छी लगती हैं पास जाने पर पता चलता है कि उनकी वास्तविकता ही कुछ और है। इस दुनिया में किसी के पास पैसा है और परिवार नहीं, परिवार है तो प्यार नहीं ,और प्यार है तो स्वास्थ्य नहीं । ऊपर वाले ने हम में से हर एक की  जिंदगी में कुछ न कुछ कमी दी है। सर्वगुणसम्पन्न यहाँ कोई भी नहीं। तो जरूरत यह है कि जो हमारे पास है उसकी कीमत समझी जाये और जो नहीं है उसको पाने का प्रयास करते रहें। जो आपके भाग्य में है वो आपको खुदबखुद  मिल ही जायेगा और जो खुशियां आपके हिस्से में नहीं आने वाली हैं वो लाख कोशिशों के बावजूद भी नहीं मिलेंगी। तो फिर फ़िक्र किस बात की।
रोबिन शर्मा की  किताब 'द मोंक हू सोल्ड हिज़ फरारी' जीवन की  इसी बात की  तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करती है कि सब कुछ पाकर भी कुछ पाने कि तलाश ताउम्र ज़ारी रहती है। और अक्सर ऐसा होता है कि  कुछ पाने कि दौड़ में कुछ ऐसा पीछे छूट जाता है जिसकी भरपाई करना मुश्किल होता है।
इस किताब में एक ऐसे आदमी का ज़िक्र है जिसके पास पैसा, पावर, सफलता सबकुछ होता है लेकिन फिर अचानक एक दिन हार्टअटैक आने पर वह खुद को मौत के बहुत करीब पाता है। और उसे अहसास होता है कि सफलता और उपलब्धियों को पाने कि दौड़  में उसने जीवन का बहुत बड़ा भाग यूँ ही व्यर्थ कर दिया।
उसने पैसा तो कमाया लेकिन उस पैसे से उसे ख़ुशी नहीं मिली उल्टा उसने अपनी सेहत गँवा दी और वक़्त से पहले ही खुद को मौत के सामने खड़ा पाया। और फिर एक दिन वो अपना सब कुछ छोड़ कर हिमालय की श्रंखलाओं में फिर से एक नए जीवन कि खोज में निकल पड़ता है।
 तो कहानी का सार यही है कि जीवन की  उपलब्धि उसे सही प्रकार से जीने में है लेकिन जीवन जीने की  कला को जान लेना हर किसी के बस कि बात नही  है। वो तो विरले ही होते हैं जो इस सत्य को समझें हैं कि जीवन का उद्देश्य आखिर है क्या? सारी  जद्दोजहद के बाद अगर आप अंदर से खुश हैं तो सब ठीक है वर्ना सब कुछ बेकार है क्योंकि खुश रहने के लिए सबकुछ होना जरूरी नहीं होता यह तो  हमारे सोचने पर निर्भर करता है | कभी हमारे पास कुछ नहीं होता फिर भी हम बेहद खुश होते हैं और कभी सब कुछ मिल जाने पर भी कहीं कुछ कमीं लगती है। लेकिन शायद इसी का नाम  जिंदगी है।

मंगलवार, 17 सितंबर 2013


सचमुच रंगमंच ही तो है जीवन, मैं देख रही हूँ शांत भाव से। पता नहीं कहाँ खोयी हुई सी। तुमने ढेरों अपेक्षाएं डाली हुयी हैं मुझ पर। और मैं कुछ भी कर पाने में असमर्थ। फिजिकली प्रेजेंट एंड मेंटली एब्सेन्ट । पर क्यों , जीवन जैसा है हम खुद वैसे ही क्यों नहीं हो जाते। बड़ी मुश्किल होती है सामंजस्य बैठाने में । तुम अक्सर कहते हो सामंजस्य बिठाओ पर मैं तुम्हें कैसे बताऊँ मैं असमर्थ हूँ ऐसा कर पाने में । तुम बाहर की दुनिया से हाथ बड़ा कर खींचना चाहते हो मुझे वहां ,पर मैं तुम्हें क्या बताऊँ मैं किस कदर उलझी हुई  हूँ  अपने अन्दर की दुनिया में ।ढेरों काम हैं मुझे अभी वहां पर। बहुत शोर भी है। कैसे समझाऊँ तुम्हें अतीत के कितने हिसाब लगाने हैं । क्या खोया क्या पाया गुना भाग सब करना है अभी। और तुम खींच रहे हो मुझे वहां से । तुम ही बताओ दो नावों में पैर कैसे रखूँ मैं । इधर जाऊं या उधर जाऊं । कुछ समझ नहीं आता । सब कुछ फैला बिखरा सा है। टूटे सपनो के कितने टुकड़े  हैं जो साफ करने हैं । कितनी यादें है जिन्हें सलीके से लगाना  है एक तरफ दिमाग में , थोडा पीछे की तरफ़। कोशिश करती हूँ कि निकल जायें पूरी तरह दिमाग से ,लेकिन निकलती ही नहीं, नागफनी के पौधे की तरह बढ़ती ही जातीं  है। अन्दर ही अन्दर चुभती है। बहुत मुश्किल हैं इन यादों को लेकर जीना । थोडा वक़्त दो मुझे इन्हें हटा दूं फिर तुम्हारे सारे काम कर दूंगी। वो जरूरी डाक्यूमेंट्स जो मैं रख कर भूल गयीं हूँ शायद वो भी मिल जायेंगे ,तुम्हारा सारा जरूरी सामान जो मैं ठीक से नहीं रख पाती  हूँ ,वो भी संभाल पाऊँ।  पर अभी थोडा समय लगेगा मुझे अपने ख्यालों और वास्तविकता की दुनियां में तालमेल बिठाने में । निकलना खुद मैं भी चाहती हूँ इस भटकाव से लेकिन क्या करूं  निकल नहीं पा रही । कोशिश करती हूँ तुम्हारी अपेक्षाओं  पर खरी उतरने की, तुम्ही बताओ  क्या मैं फेल हो गयी हूँ जिन्दगी के इम्तिहान में । क्या मैं तुम्हारी उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाऊँगी । बस ये जो शोर सा है वो थम जाये फिर सब कर पाऊंगी जो तुम चाहते हो , जिम्मेदारियां संभालना, कर्तव्यों को निभाना, वगेरह ,वगेरह। सच मैं खुद चाहती हूँ , कि  यादो की इस आपाधापी से बाहर आऊं ,भविष्य को कोरे कैनवास  की तरह नए रंगों से सजाऊं  पर हो नहीं पाता । ये कुछ काले सफ़ेद से रंग हैं जो फ़ैल गए हैं मन की किताब पर, बहुत गहरे दाग है छूटते ही नहीं ।