मंगलवार, 9 मई 2017

 गौतम बुद्ध ने जितने हृदयों की वीणा को बजाया है उतना किसी और ने नहीं। गौतम बुद्ध के माध्यम से जितने लोग जागे और जितने लोग परम भगवत्ता को उपलब्ध हुए उतने किसी और के माध्यम से नहीं। 
बुद्ध ने उनको चेताया जिनको चेताना सर्वाधिक कठिन है- विचार से भरे लोग, बुद्धिवादी, चिंतन, मननशील। प्रेम और भाव से भरे लोग तो परमात्मा की तरफ सरलता से झुक जाते है, उन्हें झुकना नहीं पड़ता। उनसे कोई न भी कहे, तो भी वे पहुंच जाते हैं, उन्हें पहुंचाना नहीं पड़ता, लेकिन वे तो बहुत थोड़े हैं और उनकी संख्या रोज थोड़ी होती गई है। अंगुलियों पर गिने जा सकें, ऐसे लोग हैं।बुद्ध ने काफी कह दिया, जरूरत से ज्यादा कह दिया। जितना समझना जरूरी हो, उससे ज्यादा कह दिया। जितने से पूरी यात्रा हो सकती है, उतना कह दिया।
पूरा सेतु निर्मित कर दिया, रास्ता पूरा साफ कर दिया।... काश! सुनने वालों में थोड़ी भी समझ होती, तो वहीं देखते जिस तरफ बुद्ध देख रहे हैं। बुद्ध क्या कहते हैं, यह समझना जरूरी नहीं है।
मनुष्य का विकास मस्तिष्क की तरफ हुआ है। मनुष्य मस्तिष्क से भरा है। इसलिए जहां जिससे हार जाए, जहां कृष्ण की पकड़ न बैठे, वहां भी बुद्ध नहीं हारते। वहां भी बुद्ध प्राणों के अंतरतम में पहुंच जाते है।
बुद्ध का धर्म बुद्धि का धर्म कहा गया है। बुद्धि या उसका आदि तो है, अंत नहीं। शुरुआत बुद्धि से है, प्रारंभ बुद्धि से है, क्योंकि मनुष्य वहां खड़ा है, लेकिन अंत, अंत उसका बुद्धि में नहीं। अंत तो परम अतिक्रमण है, जहां सब विचार खो जाते हैं।
सब बुद्धिमत्ता विसर्जित हो जाती है। जहां केवल साक्षी, मात्र साक्षी शेष रह जाता है। लेकिन बुद्ध का प्रभाव उन लोगों में तत्क्षण अनुभव होता है, जो सोच-विचार में कुशल है। बुद्ध के साथ मनुष्य जाति का एक नया अध्याय शुरू हुआ।
पच्चीस सौ वर्ष पहले बुद्ध ने वह कहा जो आज भी सार्थक मालूम पड़ेगा और जो आने वाली सदियों तक सार्थक रहेगा।  बुद्ध ने कहा हैः- मेरे पास आना, लेकिन मुझसे बंध मत जाना। तुम मुझे सम्मान देना, सिर्फ इसलिए कि मैं तुम्हारा भविष्य हूं, तुम भी मेरे जैसे हो सकते हो, इसकी सूचना हूं। तुम मुझे सम्मान दो, तो यह तुम्हारा बुद्धत्व को ही दिया गया सम्मान है, लेकिन तुम मेरा अंधानुकरण मत करना।
क्योंकि तुम अंधे होकर मेरे पीछे चले तो बुद्ध कैसे हो पाओगे? बुद्धत्व तो खुली आंखों से उपलब्ध होता है, बंद आंखों से नहीं और बुद्धत्व तो तभी उपलब्ध होता है, जब तुम किसी के पीछे नहीं चलते, खुद के भीतर जाते हो। कल्याण मित्र बुद्ध का शब्द है, गुरु के लिए। बुद्ध गुरु के शब्द के पक्षपाती नहीं, थोड़े विरोधी हैं।
बुद्ध ने अपने शिष्यों को कहा है कि मैं तुम्हारा कल्याण मित्र हूं। बुरे मित्रों की संगति न करें, न अधम पुरुषों की संगति करें।
कल्याण मित्रों की संगति करें और उत्तम पुरुषों की संगति करें।...कल्याण मित्र का अर्थ हैः- जो पहुंच गया, जिसने शिखर पर घर बना लिया। उत्तम पुरुष का अर्थ है, जो मार्ग पर है, लेकिन तुमसे आगे है, तुमसे श्रेष्ठतर है। तुमसे सुंदरतम है। उत्तम पुरुष का अर्थ है, साधु।
उत्तम परुष का अर्थ है थोड़ा तुमसे आगे। कम से कम उतना तो तुम्हें ले जा सकता है, कम से कम उतना तो तुम्हें खींच ले सकता है। कल्याण मित्र वही है, जो तुम्हारे भीतर की मनःस्थिति को बदलने में सहयोगी हो जाता है। और यह तभी संभव है, जब वह तुमसे उपर हो, उत्तम पुरुष हो।
यह तभी संभव है जब वह तुमसे आगे गया हो। जो तुमसे आगे नहीं गया है, वह तुम्हें कहीं ले जा न सकेगा। आगे ले जाने की बातें भी करे तो भी तुम्हें नीचे ले जाएगा। मैं तुम्हें बुद्ध की बात संक्षिप्त में कह दूं।
बुद्ध कहते हैं:- न कोई गुरु है, न कोई शिष्य है। और मैं तुम्हारा गुरु और तुम मेरे शिष्य! मेरे पास सिखाने को कुछ भी नहीं हैं, और आओ, मैं तुम्हें सिखाऊं। गुरु की कोई जरूरत नहीं है, और आओ, मेरा सहारा ले लो।

 बुद्धम् शरणम् गच्छामि
 एस धम्मो सनंतनो 

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

आज सुबह से प्रेम पर लिख रहे हैं लोग , प्रेम पर्व वेलेंटाइन डे , कुछ लोग विरोध भी कर रहे हैं ,
 ये प्रेम व्रेम  कुछ नही , व्यर्थ बोझ है , दुःख को आमंत्रण देना ,
मैं कहती हूँ  ठीक है , लेकिन प्रेम से क्या भागना ,
सच कहो जीवन मे हम हज़ार तरह के  दुःख और तकलीफों का बोझ ढो  रहे हैं,
प्रेम यदि दुःख है तो भाई एक दुःख और सही ,
 प्रेम केवल किसी एक इंसान से नहीं , प्रेम सब से करो ,
जितना दोगे उतना ही बढ़ेगा ,  ये पूँजी खर्च करने से बढ़ती है ,  
लेकिन सच सच बताओ , जब हम जीवन की संध्या में होते हैं तो
क्या  यही प्रेम के पल हमें ख़ुशी नही देते ?
एक मीठी सी अनुभूति , जीवन संघर्षों से  भरा है ,
बस प्रेम ही है जो ऐसे में शीतलता प्रदान करता है मन को ,
उसे भी नकारते हो , उससे भी दूर भागते हो , क्यों?
जीवन को सरल बनाना है ? तो इस झूठे आवरण को उतार फेंको ,
सभ्य समाज के सभ्य नागरिक , गुरुर से भरे  हिन्दू हैं , मुस्लिम हैं ,
 अमीर हैं गरीब हैं , बस इंसान नही हैं , किसी से ज़रा मिले नही कि
 आवरण ओढ़ लिया ,मुखौटा लगा लिया ,
कहीं वो समझ न जाये हमारे मन की स्थिति , हमारी मनो दशा ,
काहे का आवरण , कैसा घमंड , कल जब वृद्ध हो जाओगे ,
अकेले रह जाओगे तब भी तो उतारोगे न इस आवरण को , इस मुखोटे को ,
 फिर आज क्यों नही ,  बनावट की हंसी हँसते हो ,
क्यों प्रेमपूर्ण हो कर नही मिलते , सबके साथ एक जैसा व्यव्हार क्यों नहीं ,
ये कोई बड़ा , धनी आदमी है , इससे  यूँ मिलना है ,
ये गरीब है तो इससे दूर से मिलना है , ये हमारे स्तर का है , ये नही ,
कितने दिन तक इस झूठ को जिओगे ? अंत मे अकेले ही पाओगे खुद को ,
डिज़ाइनर कपड़े, डिज़ाइनर चश्मे, जूते, घड़िया , सारा  सामान ,
फिर भी खुश नही हो , क्यों, हर पल ढूँढ़ते हो किसी को, जिससे दिल की बात कह सको ,
बड़ा आसान सा तरीका है , कोई विज्ञानं नहीं , कोई गणित नही ,
जो पहला व्यक्ति मिले अब से उससे प्रेमपूर्ण हो जाओ , प्यार से सहजता से बात करो ,
जैसे हो वैसे ही रहो , कोई आवरण नही , जो कल करना है आज से करो ,
 किसने कहा धन तुम्हें बड़ा बनाता है ? ताकतवर बनाता है , ,
 एक क्षण में बीमारी आती है और हमारा सारा गुरुर ,
सारा अहम अस्पताल के स्ट्रेचर पर विवश होकर पड़ जाता है ,
जीवन फिर से जीने की चाह लिए हुए ,  उसी पल का सोच का विनम्र हो जाओ ,
सहज हो जाओ , मैं इसी को प्रेम कहती हूँ , मेरे लिए यही पूजा है , यही प्रार्थना ,
मैं सबसे प्यार से मिलती हूँ और बदले में  हज़ार गुना अधिक प्रेम पाती हूँ ,
यही सबसे अधिक शक्तिशाली बनाता है , सबसे अधिक शांति देता है। ..... 

रविवार, 15 जनवरी 2017

इंस्टेंट नूडल हो गया है प्रेम कि एक दिन निर्धारित कर लो और उस दिन इज़हारे मोहब्बत कर दो। बाकि ३६५ दिन भले ही जूते चप्पल बजते रहे। वैश्वीकरण तथा बाज़ारीकरण लोगो की मनोदशा को मुट्ठी में बंद किये बैठा है। और सफेदी लिए हुए बालों के साथ जवान होते बेटे बेटियों के सामने माता पिता भी एक दुसरे को फूल और कार्ड दे कर अपने नवीन प्रेम को प्रदर्शित कर रहे हैं। वहीँ शहर के किसी और कोने में उन्हीं की बेटियां भी अपने वैलेंटाइन के साथ इस पावन पर्व को सेलिब्रेट कर रहीं हैं। क्या प्रेम को किसी एक निर्धारित दिन के अनुसार व्यक्त किया जा सकता है?
दुनिया वाकई बहुत तेजी से बदल रही है और प्यार करने और उसे जताने के तरीके भी। 
इंटरनेट क्रांति ने आज की पीढी को ज्यादा मुखर बना दिया है| फेसबुक ट्विटर से लेकर व्हाट्सएप जैसे एप आपको मौका दे रहे हैं कि कुछ भी मन में न रखो जो है बोल दो| 
सुना है हर जिले में एक बाल संरक्षण समिति होती है जिसका कार्य होता है उस जिले में रहने वाले गरीब तबके के , बेसहारा बच्चों के लिए कार्य करना…  शिक्षा के क्षेत्र में तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं के मद्देनज़र कार्य योजनाएं बनाना तथा उनको कार्यान्वित करना .... आश्चर्य की बात है कि हमारे क्षेत्र में जहाँ मुझे हर जगह सड़कों पर भीख मांगते ,मजदूरी करते बच्चे दिखाई देते हैं वहां हमारे क्षेत्र के शिक्षा विभाग और बाल संरक्षण समिति के पास इन बच्चों का कोई ब्यौरा नहीं है …  वर्षा की फोटो मैने बहुत पहले भी फेसबुक पर पोस्ट की थी .... वो मेरे यहाँ आने वाले बच्चोँ के साथ पढ़ रही है.…लेकिन इसके जैसी और भी बहुत सी बच्चियाँ हैं … क्या होगा इनके भविष्य का.…??
प्रेम मुक्त करता है.... बांधता नहीं है… चाहे वो प्रेयसि का हो , माँ का, मित्र का या पत्नी का। और यदि वो बंधन में बाधता है तो वो प्रेम हो ही नहीं सकता … क्योंकि प्रेम एक विश्वास का नाम है और जहाँ विश्वास नहीं वहां प्रेम भी नहीं हो सकता। 
जीवन को सही तरह से समझना है तो ठहराव जरूरी है।  गतिशील जीवन में हम न तो स्वयं को समझ सकते हैं और न दूसरों को। हाँ यदि केवल उपलब्धियों को ही जीवन मान लें तो ठहराव संभव नहीं , और यदि उपलब्धियों से परे जीवन को जानने का प्रयास करना है तो थमना होगा , रुकना होगा। ऐसे में संभव है भीड़ में पीछे रह जाना , एकाकी हो जाना ,लेकिन उस ठहराव में ही ज्ञान होता है जीवन की सही दिशा का उसके गंतव्य का। 
सुबह फोन पर  राकेश शर्मा सर से समसामयिक विषयों पर चर्चा हुई  । इस कविता के साथ सर ने बहुत सी बातें कहीं जो मन के किसी कोने में सहेज दी हैं ,,  वास्तव में आध्यात्मिक वा ज्ञानी व्यक्तित्व के स्वामी हैं सर ,सफलता के शीर्ष पर पहुचकर भी विनम्र व सरल व्यक्तित्व, जिन्हें अभिमान छू भी नही सका, असीमित ज्ञान , तेजस्वी व्यक्तित्व। कविता सुन कर मैंने हठपूर्वक सर से निवेदन भी किया कि वे इन्हें औरों के साथ बांटें।
संबंधों का अब कोई सम्बन्ध
रहा नहीं बाकी  ,
द्वेत से अद्वैत हो गया हूँ मैं ;
     समुद्र की लहर हूँ मैं ,
     चन्द्रमा की पूर्णिमा हूँ मैं,
     रजनीगंधा की सुगंध हूँ मैं ,
    सूर्य की अरुणिमा हूँ
    द्वैत से अद्वैत हो गया हूँ मैं ;
वसुंधरा का प्रसाद हूँ मैं ,
फिर से प्रसाद होने को
बीज हो गया हूँ मैं ,
द्वैत से अद्वैत हो गया हूँ मैं ;
    काल से अकाल  हो गया हूँ मैं,
   अपूर्ण से पूर्ण हो गया हूँ मैं ,
   द्वैत से अद्वैत हो गया हूँ मैं ;
जो ब्रह्माण्ड है वो मैं हूँ,
और जो मैं हूँ वो ब्रह्माण्ड है ;
अहं ब्रह्मास्मि....अहं ब्रह्मास्मि.....अहं ब्रह्मास्मि।।