सोमवार, 8 जुलाई 2013

"दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन…."

           गर्मी की छुट्टियाँ खत्म , फिर से जिन्दगी अपने उसी पुराने ढर्रे पर चल पड़ी है। खूब सोये, फिल्में देखीं, किताबें पढी , घूमे फिरे और मज़ा किया । पर हमेशा तो ये सब नहीं चल सकता है न। तो फिर शुरू हो गया काम का सिलसिला।। सुबह जल्दी उठ कर बच्चों को स्कूल भेजना, पति को ऑफिस और खुद भी अपनी  क्लास के लिए तैयार होना।  काम निबटाते -निबटाते रात के 12  बजेंगे और थकावट से चूर आप कब सो जायेंगे पता ही नहीं चलेगा | और इसी तरह हमारी जिन्दगी का और एक दिन गुज़र गया । पर जनाब इसी का नाम तो है जिन्दगी | आराम के लिए वो एक सन्डे भी तो मिलता है। तो उस दिन सोचते हैं कि घर और बाहर के सारे पेंडिंग काम निपटा लिए जायें । तो सन्डे तो आने वाले हफ्ते की सारी तैयारियों में ही निकल जाता है।
      लेकिन मेरे लिए फुर्सत का मतलब ढेर सारा आराम करना नहीं है। छुट्टियाँ या फुर्सत मेरे लिए वो कीमती और बहुत मुश्किल से मिलने वाला वक़्त है जो मैं अपने और अपने परिवार के साथ गुज़ारना चाहती हूँ । सैर सपाटा करते हुए नहीं और ना हीं फिल्म देखते हुए और ना ही बाहर किसी अच्छे रेस्तरां में खाना खाते हुये। बल्कि वो खाली वक़्त जब हम थोडा थमें, रुकें और सोचें कि  हम आखिर कहाँ जा रहे हैं । हम घर चलाने के लिए कमाते हैं, बच्चे अपने बेहतर भविष्य की तैयारी के लिए पढ़ाई करने में लगे हुए हैं । लेकिन इन सब के बीच जो धीरे -धीरे ख़ामोशी से खिसक रहा है. वो हमारा आज, मेरे लिए वही फुर्सत, वही वक़्त बेहद जरूरी चीज़ है। वही तो है जिन्दगी, जो दस-दस साल के अन्तराल में बदली हुई सी लगती है | पता नहीं चलता कैसे रेंग कर गुज़र जाती है हमारी पहुँच से बहुत दूर। और हम कहते हैं कि पता नहीं चला बच्चे कब बड़े हो गए, वक्त  कैसे गुज़र गया ।
      तो जब भी मुझे फुर्सत के पल मिलते हैं तो मैं चाहती हूँ कि परिवार के साथ रहूँ, खुद को वक्त दूं, और वो सब करूं जो मैं अब इसी आज में करना चाहती थी। चाहें फिर उनके साथ बैठ कर उनके स्कूल की शैतानियों भरे किस्से सुनना ही क्यों न हो और या फिर उनकी कभी न ख़त्म होने वाली फरमाइशों की लिस्ट जानना ।
 हम सब हमेशा अपने ही कामों में लगे रहते हैं, देखा जाये तो हम अपने जीवन का आधे से ज्यादा समय सोने में, दैनिक कार्यों में ,पढाई करने में और नौकरी या बिज़निस में ही निकल देते हैं । रहा सहा आधा समय मित्रों, रिश्तेदारों, सगेसम्बंधियों और भी बहुत से सोशल ओब्लिगेशन्स को निबटाने में निकल जाता  हैं। परिवार का नंबर आते-आते इतनी देर हो जाती है कि सुनने को मिल ही जाता है ' आपके पास टाइम है ही कहाँ?' मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो हमेशा टाइम न होने का रोना रोते रहते हैं ।  टाइम मैनेजमेंट  तो एक ऐसी कला है जो कॉर्पोरेट ट्रेनर नहीं बल्कि खुद समय और आवश्यकता ही हमें सिखा देती है | लेकिन मेरी यही कोशिश है कि बिज़ी और खाली समय के बीच एक संतुलन बना रहे। और शायद मेनेजमेंट की भाषा में उसी को कहते हैं वर्क- लाइफ- बेलेंस | क्योंकि कहा जाता कि हमारे जीवन के लिए काम करना जितना जरूरी है ,खाली रहना भी उतना ही जरूरी है । क्योंकि व्यक्ति रचनात्मक तभी हो  सकता है जब उसके पास ढेर सारा समय हो। विचारों के पनपने और उनके संयोजन में खाली समय का बहुत योगदान होता है। इस बात पर एक पुराने गीत की लाइनें याद आ रही हैं "दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन…."

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