रविवार, 14 दिसंबर 2014

अभी घर में सफाई करते वक़्त एक पुराने मोबाइल का मेमोरी कार्ड मिला।  जिसमें कुछ गुज़रे सालों के वीडियो क्लिप थे। देख कर दिल खुश हो गया। बहुत ही खूबसूरत लम्हे कैद थे उन वीडियो क्लिप्स में। एक वीडियो में मेरा नन्हा सा बेटा खिलखिलाकर हंस रहा था। उम्र कोई एक साल की रही होगी। ऐसा लगा कि मैंने उसे पहली बार देखा है। मैं तो भूल ही गई थी कि वो तब कैसा दिखता था। अगली क्लिप में मेरी तकरीबन दो साल की बेटी डांस कर रही थी। उसका गोल-मटोल प्यारा सा चेहरा देख कर जी किया कि उसे जी भर कर प्यार करूँ। कितनी शैतान थी वो, कितनी नटखट। अगली कई क्लिप्स भी उन दोनों की शैतानियों से भरी थीं। कभी रसोई में आटे के ड्रम से पूरा आटा निकाल कर एक दूसरे के सर पर डाल देते थे और कभी पूरा वाशिंग पाउडर का डिब्बा बाल्टी में डाल कर झाग ही झाग बना देते थे। एक बार इसी तरह दोनों मुझे फ्लैट में बंद कर के खुद दरवाजे से बाहर निकल गए । तब तक वे सिर्फ दरवाजे को बंद करना जानते थे उसे खोलना नहीं। खिड़की से वॉचमन को आवाजें लगा कर किसी तरह मैंने दरवाजा खुलवाया। अगली वीडियो में था आगरा से भोपाल जाने के बाद हमारा पहला घर। वो घर जिसे देख कर मुझे एक गीत की ये  पंक्तियाँ याद आ गई थीं - 'फूलों के शहर में हो घर अपना '। बहुत ही शांत प्रिय और सभ्य लोगो की कॉलोनी थी वो । वहीँ हमारे बच्चों ने पहली बार चलना सीखा। वीडियो  बाहर मेन गेट  की थी जहाँ दोनों बच्चे थे। घर की खिड़की से कोई गाना बजने की आवाज आ रही थी।  वहां जाते वक़्त मैं अपना म्यूजिक प्लेयर साथ ले जाना नहीं भूली थी। जिसमें अपने मनपसंद  गाने लगा कर में बच्चों में व्यस्त हो जाती थी। अनजान लोग, अनजाना शहर, फिर भी बहुत खुश थी मैं। घर के सामने ही तरह -तरह के फूलों से भरा बगीचा था, जो उस वीडियो क्लिप में नज़र आ रहा था। घर के सामने एक साउथ इंडियन परिवार रहता था जिनके दो टीनएज बच्चे थे शायद रोहित और रीतिका । अब तो वे बहुत बड़े हो गए होंगे। और भी बहुत से परिवार थे वहाँ। मुझे आज भी याद है कि वो हमारा पहला दिन था भोपाल में।  घर में सामान सेट करने के बाद हम रात को कॉलोनी में टहलने के लिए निकले। कॉलोनी में गणेश उत्सव मनाया जा रहा था। वहीँ सब से मुलाकात हो गई और कुछ ही पलों में वो पराया सा लगने वाला शहर मेरा अपना हो गया और वहां के लोग भी। दूसरी क्लिप हमारे कानपुर वाले घर की थी।  उस क्लिप में भी बच्चे बहुत छोटे थे। शायद बेटे का तीसरा जनम दिन था उस दिन। और हम कहीं बाहर डिनर के लिए जा रहे थे। बच्चे सजे-संवरे खड़े हुए थे। कानपुर की उन तीन चार क्लिप्स में से दो वहां के मॉल की हैं। जिनमें हम शायद नया साल मनाने आए हुए थे। देख कर ख़ुशी हुई की कैसे मैं दोनों बच्चो के साथ मॉल में घूम रही थी। कोई फ़िक्र नहीं, बस यूँही हँसते मुस्कुराते हुए वक़्त बिता रहे थे। दिल से आह सी निकली, काश वक़्त उन लम्हों में ही रुक जाता ,ठहर जाता। लेकिन वक़्त कब किसके रोके रुकता है। जिंदगी की हबड़-तबड़ में वक़्त कितनी जल्दी गुज़र गया कुछ पता ही नहीं चला। ये मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत समय था। शादी के कुछ साल बाद ही अपना शहर छोड़ कर छोटे-छोटे दो बच्चों के साथ दूसरे शहरों में निकल जाना। और फिर करीब १० सालों तक चार अलग-अलग शहरों में रहना। ऐसा लगा ठीक से बच्चो को बड़ा होते देख ही नहीं पाई।  ज़िन्द्गी के सबसे हसीं पल यूँ ही गुज़र गए। कितने प्यारे लगते थे बच्चे। मैं खुद भी कहाँ बहुत बड़ी थी। २४-२५ साल की उम्र और दो छोटे बच्चों और घर की जिम्मेदारी। लेकिन  हँसते खेलते वक़्त गुज़र ही गया। इसी बीच बहुत से नए लोगो से भी मिली।  जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए। लेकिन अब मुड़ कर देखो तो लगता है कि शायद इस वक़्त को और बेहतर तरीके से भी जिया जा सकता था। बच्चो पर और खुद पर थोड़ा और ध्यान दिया जा सकता था। लम्हों को कुछ और जिंदादिली से जिया जा सकता था।  लेकिन ये तो सिर्फ एक ख्याल है। वक़्त जैसे भी गुज़रा अच्छा  गुज़रा।  उन वीडियो क्लिप्स को देख कर एक अजीब सा अहसास हुआ कि अगर अगले दस सालों बाद फिर मुझे कोई वीडियो क्लिप मिले तो मैं इन लम्हों को देख कर भी क्या यूँ ही खुश हो पाऊँगी। ऐसा लगा की वक़्त ने मेरे दरवाजे पर दस्तक दे कर कहा है कि रुको थोड़ा। देखो मैं  कितनी तेज़ी से बदल रहा हूँ।  जिंदगी गुज़र रही है ,जी भर कर इसका मज़ा लो। इसे जिंदादिली से जियो। क्यूंकि ये वक़्त फिर वापिस नहीं आएगा। तो अपनी जिंदगी की तमाम खूबसूरत चीज़ों से प्यार करो। बच्चो को  खूब दुलार दो। जीवन साथी के साथ थोड़ा वक़्त गुज़ारो । यूँ लग रहा है मानो झिंझोड़ कर रख दिया है मुझे । और मैं नींद से जाग उठी हूँ। महसूस हो रही है हर लम्हे की कीमत । जिंदगी हर मोड़ पर हमें वक़्त की कीमत बताती है। हम फिर भी अनजान से रहते हैं। और खुद को यूँही बेवजह की बातों में मसरूफ रख कर वक़्त यूँही गुज़र देते हैं और बाद में मलाल करते हैं। इंसान तजुर्बों से सीखता है और इस वक़्त मुझे वो शेर याद आ रहा है ''क्या कहें जिंदगी में क्या होगा , कुछ न होगा तो तजुर्बा होगा ''।

1 टिप्पणी:

  1. पुरानी यादें ऐसी ही होती हैं .... मन को कहीं का कहीं ले जाती हैं ...

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