शनिवार, 19 नवंबर 2016

ये प्रेम कहानी अलग है ,थोड़ी जुदा , यहाँ एक शर्मीली सी राजकुमारी है, एक खूबसूरत सा, संस्कारी, माँ का आज्ञाकारी, राजकुमार भी है , लेकिन वो सब नही है जो और प्रेमकहानियों में होता है , हमने शादी से पहले एक दूसरे के साथ वक़्त नही गुज़ारा ,फोन पर घंटो बातें नही की , घूमे फिरे नही , और तो और शादी के बाद हनीमून पर नही गए,  दो साल तक कभी कोई फिल्म देखने नही गए ,कहीं एक दिन को भी कभी अकेले नही गए  ......  मैं दूसरे नए शादी शुदा जोड़े को देखती थी , मेरी कई सहेलियों की शादी तय हुई , रिश्ता तय होते ही लड़के लड़कियां एक दुसरे के साथ इनफॉर्मल हो गए ,बेझिझक घूमने फिरने लगे , खुद अपनी शादी की तैयारी करने लगे , और लड़के शादी के बाद मजनुओं की तरह लड़की के आगे पीछे घूमने लगते थे , ना किसी की चिंता न फ़िक्र ,, दुनिया को भूल कर अपने में मस्त।  हम दोनों इससे बहुत अलग थे , वो जैसा कि मुझे लोगो ने बताया था मम्माज बॉय था, या यूँ कहें कि उसकी माँ ही उसकी दुनिया थीं, उसके पास मेरे लिए वक़्त नहीं था , घर की ढेरों जिम्मेदारियां और चिन्ताएं ,उसे सब को देखना होता था , सबकी सुननी होती थी, वो जब ऑफिस से घर आता तो सब उसे घेर लेते और वो बड़े सब्र से सबकी जरूरतें और फरमाइशें सुनता , और पूरी भी करता , मैं हैरान सी देखा करती , कभी चिढ़ती , कभी रश्क़ भी करती, इतनी कम उम्र और इतनी समझदारी ,चार भाई बहनो में सबसे छोटा ,लेकिन छोटा होते हुए भी सबसे अधिक जिम्मेदार और माँ का विश्वासपात्र और होनहार बेटा , वे उस पर पूरी तरह निर्भर थी ,अपनी हर बात हर परेशानी उसे बतातीं , इस कदर कि मैं कभी कभी खुद को अनवांटेड सा फील करती , लेकिन धीरे धीरे समझ में आया कि बडे भाग्यशाली होते हैं वो बेटे जो माँ के सभी आदेशों को मान कर अपना जीवन केवल उनकी आज्ञा को पूरा करने में लगा देते हैं , माँ को क्या फ़िक्र है , घर में किसे क्या जरुरत है , घर की सभी जिम्मेदारी उठाना,  12 साल की उम्र में ही पिता को खो दिया था ,लेकिन अब खुद पिता बन कर माँ के बोझ को हल्का करना , मैं इंतज़ार करती रही और फिर वो दिन भी आया जब माँ के सारे कर्तव्यों को पूरा करके वो मुझे और मेंरे बच्चो को समय देने लगा ,दिल में इत्मीनान था , जो हमेशा दूसरो के काम आया अब उसकी बारी थी खुद के लिए कुछ खुशियों के पल चुराना , तो फिर हम निकल लिए अपनी और केवल अपनी जिंदगी के सफर पर, एक दूसरे का हाथ थामे और गोद में दो नन्हे मुन्नो को लिए , सच कहूँ तो हमारी लव स्टोरी शादी के कई साल बाद शुरू हुई , हनीमून भी मनाया लेकिन दो बच्चों के साथ ,थोड़ी नोकझोंक और तकरार के साथ गुज़र ही गए इश्क़ के चौदह साल , लेकिन सच कहूँ आज भी मजनू टाइप पतियों को देखती हूँ तो लगता है कि कहूँ  कुछ सीखो हमसे , संस्कार , सुशीलता, त्याग और ढेर सारा सब्र ..... ... उसकी माँ को फक्र था उस पर और मेरे माता पिता को मुझ पर है , हम वो हैं जिन्हें दुआओं पर भरोसा है :):)

2 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय भावना जी कृपया आप अपने ब्लॉग को ब्लॉगसेतु ब्लॉग एग्रीगेटर से जोड़ने की कृपा करें ताकि आपके लेखन से अधिक से अधिक पाठक लाभान्वित हो सकें.

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